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आप्तवाणी - ८

सारे आध्यात्मिक शास्त्रों, उपदेशों और क्रियाओं का सार एक ही है –स्वयं को जानना (स्वयं के बारे में जागरूकता)। जो हम स्वयं हैं वह पूर्ण शुद्ध है, लेकिन ‘मैं कौन हूँ’ की धारणा गलत है। इस पुस्तक में यह गलत धारणा वर्तमान ज्ञानीपुरुष द्वारा दूर की गई है।
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Description

इस पुस्तक में स्वयं के मूल गुणों के बारे में तथा अन्य शाश्वत तत्वों के बारे में बताया गया है। यह ज्ञान ज्ञानीपुरुष परम पूज्य दादाश्री जो की अक्रम विज्ञान के प्रणेता हैं, उनके द्वारा दिया गया है।

ऐसे बहुत से प्रश्न हैं जो लोगों के मन में अक्सर उठते हैं, जैसे- ‘मैं कौन हूँ?’ मुझे स्वयं के बारे में ज्ञान कैसे मिले या मैं स्वयं को कैसे जानूं? जन्म-मरण क्या है? आत्मा का वैज्ञानिक स्वरूप क्या है? इस प्रकार के अनेक सवालों के जवाब परम पूज्य दादाश्री ने इस किताब में पूर्ण संतुष्टता के साथ दिए हैं।

सारे आध्यात्मिक शास्त्रों, उपदेशों और क्रियाओं का सार एक ही है –स्वयं को जानना (स्वयं के बारे में जागरूकता)। जो हम स्वयं हैं वह पूर्ण शुद्ध है, लेकिन ‘मैं कौन हूँ’ की धारणा गलत है। इस पुस्तक में यह गलत धारणा वर्तमान ज्ञानीपुरुष द्वारा दूर की गई है। पुस्तक अनेक भागों में विभाजित है जिसमें प्रथम भाग में दादाजी ने- ‘स्वयं’, उसके गुण तथा दूसरे भाग में स्वयं को जानने का रास्ता दिखाया है।

इस पुस्तक में उन लोगों का मार्गदर्शन किया गया है जो स्वयं को जानना चाहते हैं और मुक्त होना चाहते हैं।

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