Description
प्रस्तुत पुस्तक परम पूज्य दादाश्री की अमृतवाणी का संकलन है। इस पुस्तक में दादाश्री ने अत्यंत सरल, सहज और दृष्टांतयुक्त शैली में अंतःकरण के इन चारों पहलुओं का गहन विश्लेषण किया है। सामान्यतः हम इन शब्दों का प्रयोग तो करते हैं, परंतु उनके वास्तविक स्वरूप, उनकी कार्यप्रणाली तथा उनके बीच के भेद से अधिकांशतः अनभिज्ञ रहते हैं।
परम पूज्य दादाश्री इस पुस्तक में अंतःकरण के इन चार अंगों के गूढ़ रहस्यों को, जिनकी खोज के लिए आज भी संसार प्रयासरत है, अत्यंत सहजता से उद्घाटित करते हैं। दादाश्री इन चारों अंगों की आंतरिक कार्यप्रणाली, उनके स्वरूप तथा शरीर में उनके स्थान की सटीक जानकारी प्रदान करते हैं।
विशेष रूप से, पशुओं और मनुष्यों के अंतःकरण के बीच का अंतर, बच्चे का अंतःकरण, मनुष्यों में अंतःकरण का विकास तथा अंतःकरण की शुद्धि के उपायों पर भी प्रकाश डाला गया है।
यह ज्ञान पाठक को अपने आंतरिक संघर्षों को समझने में सहायता करता है और अंततः स्व-स्वरूप की पहचान के माध्यम से शाश्वत शांति के अनुभव की ओर ले जाता है।
इस विषय की और अधिक गहन तथा विस्तृत समझ ‘आप्तवाणी १० (पूर्वार्ध एवं उत्तरार्ध)’ पुस्तक से प्राप्त की जा सकती है, जो पाठक के गहन अध्ययन में अत्यंत सहायक सिद्ध होगी।