Note: Due to ongoing situation in the Middle East, please email [email protected] with your order details before purchasing internationally. We will confirm the applicable courier charges for you in advance.
  • INR
Close

Books

  • Picture of आप्तवाणी - 13  (purvardh)

आप्तवाणी - 13 (purvardh)

प्रस्तुत पुस्तक में अक्रम विज्ञानी ज्ञानीपुरुष की वाणी प्रकाशित हुई है। जिन्हें विश्व में परम पूज्य दादाश्री के नाम से जाना जाता है।

Rs 120.00

Description

प्रस्तुत पुस्तक में अक्रम विज्ञानी ज्ञानीपुरुष की वाणी प्रकाशित हुई है। जिन्हें विश्व में परम पूज्य दादाश्री के नाम से जाना जाता है।

कभी शास्त्र, कभी आध्यात्मिक सत्संग और कभी आध्यात्मिक क्रियाओं का एक ही और समान सार है। और वह है ‘आत्मा का ज्ञान और जागृति’ प्राप्त करना। ‘खुद’ शुद्ध है लेकिन खुद को ‘मैं कौन हूँ’ कि रोंग बिलीफ है। ‘मैं चंदूभाई हूँ’ कि यह रोंग बिलीफ ने प्रकृति बनाई है। इस जगत् में मात्र दो ही वस्तुएँ हैं, जड़ और चेतन। दोनों अनादी से सर्वथा भिन्न और बिल्कुल निराले हैं, लेकिन दोनों वस्तुओं के मिलने से विशेषभाव उत्पन्न हो जाता है, ‘मैं चंदूलाल हूँ,’ जो आत्मज्ञान के मूलभूत सिद्धांत को, ‘मैं शुद्धात्मा हूँ,’ से असंगत है।

प्रस्तुत पुस्तक में अक्रम विज्ञानी ज्ञानीपुरुष की वाणी प्रकाशित हुई है। जिन्हें विश्व में ज्ञानीपुरुष दादाश्री के रूप में जाना जाता है। उन्होंने प्रकृति के रूटकॉज़ की, प्रकृति को किस तरह आत्मा से जुदा रखना है और किस तरह से प्रकृति को मात्र देखते ही रहना है, उसकी विस्तारपूर्वक समझ दी है। प्रस्तुत ग्रंथ १३ पूर्वार्ध में आठों प्रकार के कर्मों को विस्तारपूर्वक समझाया गया है।

यह पुस्तक प्रकृति और कर्मों के विज्ञान (साइन्स) के बारे में जागृति लानेवाली है।

Product Tags: Aptavani-13 (P)
Read More
success